मासिक धर्म (Periods)

जब छोटी थी, तब सुनने को मिलता था कि खून छूटेंगे तो पता चलेगा | समझ में नहीं आता था कि खून क्यों छूटेंगे | क्या होने वाला है, जिसके बारे में पहले से ही सबको पता है ? खैर, 16 वर्ष की उम्र में पहली बार खून के धब्बे देखे | ऐसा व्यवहार हुआ जैसे मैंने कोई बहुत भारी अपराध कर दिया हो | एक पुराना कपड़ा हाथ में दे दिया गया कि इसे लगा लो | मैं भौचक्की सी उस कपड़े को देखने लगी कि इसका क्या करूँ, कहाँ लगा लूँ | खैर, मुझ पर तरस खाया गया और कपड़ा लगाने का तरीका समझाया गया | चलने-फिरने, उठने-बैठने में बड़ा अजीब लग रहा था | खो-खो, पिटठू जैसे गेम खेलने से डर लगने लगा कि कहीं कपड़ा खिसक न जाये, कपड़ों पर दाग न लग जाये | एक दो बार ऐसा हुआ भी | वो पांच दिन मेरे लिए भयंकर यातना से कम नहीं थे | हर समय पेट में दर्द, उठने बैठने में तकलीफ और अछूत बनने की पीड़ा |खैर, बड़ी हुई तो सेनेटरी नैपकिन के बारे में पता चला | उन्हें इस्तेमाल करना शुरू किया | पहले से कुछ राहत मिली | पर वो जो पहला अनुभव था, वो इतना भयंकर था कि अब तक उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा | अब समय बदल चुका है | लोग खुलकर इस विषय में बात करने लगे हैं | अब तो इस विषय पर फिल्म भी बन चुकी है | खेद का विषय यह है कि हमारी वर्तमान सरकार ने सेनेटरी नैपकिन को टैक्स फ्री करने के बजाय उस पर GST लगा दिया | खैर, जो मेरे साथ हुआ वो मैंने अपने बेटी के साथ नहीं होने दिया | उसे सब स्पष्ट रूप से समझाया कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इससे डरने की जरुरत नहीं है | आज मेरी बेटी पीरियड्स के दिनों में शॉर्ट्स भी पहनती है, बिलकुल भी असहज नहीं होती |मैं उससे ‘उन’ दिनों मैं दीया भी जलवाती हूँ | अचार भी निकलवाती हूँ | कहने का मतलब यह है कि जैसा व्यवहार उसके साथ महीने के 25 दिनों में होता है ठीक वैसा ही ‘उन’ पांच दिनों में भी होता है | मेरा सभी महिलाओं से अनुरोध है कि रूढ़िवादी विचारों से बाहर निकलें और अपना व् अपनी बेटियों का भविष्य सुन्दर बनायें |

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