नारी की दशा

एक न्यूज़पेपर में पढ़ा कि एक विशेष जाति में वर वधु को फेरों के बाद एक कमरा दे दिया जाता है | बिस्तर पर सफ़ेद चादर बिछा दी जाती है | अगले दिन वह चादर पंचों को दिखानी होती है | अगर सफ़ेद चादर पर खून के निशान हों तो ही शादी मान्य होती है | अगर खून के निशान न मिलें तो लड़की को पीटा जाता है और सजा भुगतने के बाद ही शादी मान्य की जाती है | अब सवाल यह उठता है कि यह टेस्ट लड़कियों के लिए ही क्यों ? लड़की को भी अधिकार है यह जानने का कि जिस लड़के से वह विवाह कर रही है वह वर्जिन है या नहीं | अगर लड़के के लिए ऐसा कोई टेस्ट नहीं है तो लड़की के लिए क्यों ???? क्या लड़की कोई वस्तु है ? यह तो ऐसा हुआ कि स्टील के बर्तनों की दुकान पर गए, कोई बर्तन पसंद आया तो ठोक बजा कर देखने लगे कि ठीक तो है, कोई निशान तो नहीं है ? अरे भाई, लड़की और लड़का एक ही कोख से जन्म लेते हैं | लड़का होने की फैक्ट्री अलग और लड़की होने की फैक्ट्री अलग नहीं होती | सिर्फ लिंग भेद होने से अधिकारों में भेद क्यों आ जाता है |

ऐसे ही एक वाकया हुआ कि किसी विशेष फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे और जो लोग विरोध कर रहे थे उन्होंने औरतों का ब्रेनवॉश करके उन्हें जौहर के लिए उकसाया और मीडिया के सामने छाती ठोक कर बोले कि फिल्म प्रदर्शित हुई तो हमारी औरतें जौहर के लिए तैयार बैठी हैं | अरे भाई, तुम्हे गुस्सा आ रहा है, तुम्हारे सीने में आग धधक रही है तो तुम जौहर करो | चलो पूरा शरीर मत जलाओ, सिर्फ हाथ जला कर दिखाओ या सिर्फ पैर| क्या कहा ? जौहर सिर्फ औरतें करती हैं | वाह रे मर्दों की जात | अतीत बन चुकी एक नारी की इज्जत की रक्षा करने के लिए वर्तमान में जी रही 16,000 नारियों को आग में धकेलने के लिए तैयार बैठे हो | और वाह री नारी, फिर से मर्दों के हाथों का खिलौना बन कर उनके बताये रास्ते पर चलने के लिए तैयार बैठी हो, ये जाने बिना कि वाह रास्ता गलत है या सही |फिल्मों में हीरोइन को आइटम गर्ल की तरह पेश करना भी हम औरतों की छवि को ख़राब करता है | एक लड़की नाच रही है और बहुत सारे मर्द लार टपकाते हुए उसे चारों तरफ से घेरे हुए हैं |

अब ये सब बातें जो मैंने कही, इनका क्या हल है कि लड़कियां बगावत करें, विद्रोही बनें | नहीं, वे ऐसा भी नहीं कर सकती | ऐसा मेरा विचार है | क्यों नहीं कर सकतीं ? क्योंकि उनका पालनपोषण ही इस तरह हुआ है कि जो भी उनके साथ होता है उसे वे स्वीकार कर लेती हैं | परिवार के संकुचित रीति-रिवाजों को वे मान लेती हैं क्योंकि उनके पास ऑप्शन नहीं है | परिवार से बाहर तो भूखे भेड़िये बैठे हैं जो भनक मिलते ही उसे नोच कर खा जाने के लिए आतुर बैठे हैं | हम औरतों का अतीत और वर्तमान तो सुन्दर नहीं है पर आशा करती हूँ कि भविष्य सुन्दर हो |

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